पिछले साल दिसंबर में महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने राज्य के कम छात्र संख्या वाले 1314 जिला परिषद् स्कूलों को बंद करने का फैसला किया था। जनवरी 2018 तक इनमें से 1300 स्कूलों को बंद किया जाना था। उस समय महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री विनोद तावडे द्वारा जो तर्क दिया गया था उसका भी काफी विरोध हुआ था। सरकार का तर्क था कि इन स्कूलों में छात्रों की संख्या दस या उससे भी कम होने के कारण इन स्कूलों को बंद किया जा रहा है। जबकि इसके विपरीत शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के अनुसार, 20 से कम छात्रों वाले किसी भी स्कूल को बंद किया जा सकता है।

उस समय शिक्षा मंत्री तावड़े ने अपने तर्क में कहा था कि इन स्कूलों में 10 या उससे कम छात्र पढ़ते हैं जोकि औसत नामांकन से कम हैं। सरकार केवल इतने छात्रों के लिये स्कूल का खर्च उठाने को तैयार नहीं है हालांकि यह निर्णय शिक्षा विभाग के सुझाव पर केवल छात्रों के लाभ के लिए लिया गया है। बाद में महाराष्ट्र सरकार ने सफाई देते हुए कहा था कि उन्होंने यह फैसला सर्वे के बाद लिया है। राज्य सरकार इन स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों को तीन किलोमीटर के दायरे में स्थित सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में समायोजित करेगी।

हक़ीकत तो कुछ और है

पुणे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता मुकुंद किरदत

पुणे में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता मुकुंद किरदत ने इस मुद्दे की वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हुए बताया, ‘आरटीई अधिनियम के अनुसार, छात्रों को उनके आसपास के क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में शिक्षा प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है। हालांकि, महाराष्ट्र में बहुत सारे ऐसे गांव हैं जहां बच्चों को अपने स्कूलों तक पहुंचने के लिए दो से तीन किलोमीटर तक पैदल चलकर जाना पड़ता है। इनमें से अधिकांश बच्चों के माता-पिता समाज के निचले तबके से आते हैं। इनके ज्यादातर माता-पिता काम के लिए बाहर जाते हैं। इनमें से अधिकतर गांवों की परिवहन सुविधा घटिया है और कुछ गांवों में तो सड़कें भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में छोटे-छोटे बच्चों के पास स्कूल पैदल जाने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है जो उनके लिए बहुत मुश्किल बात है।’

उन्होंने आगे बताया, ‘हम लोग महाराष्ट्र के मावल रीजन के कुछ गांवों में शोध करने गए थे। उन गांवों में जो परिवार रहते हैं काफी कम संख्या में हैं और उनमें से अधिकतर लोग दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में रहते हैं। माता-पिता के लिए हर दिन स्कूल में अपने बच्चों हो छोड़कर आना मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर सरकार ने घोषणा की है कि स्कूलों में बच्चों की संख्या 20 से कम नहीं हो सकती है। इस स्थिति में सरकार दावा करती है कि सामाजिक विकास सुनिश्चित करने के लिए यह महत्वपूर्ण है। हालांकि, मेरा मानना है कि आसपास के क्षेत्रों में स्कूलों को स्थापित करना और उनमें से अधिक से अधिक नामांकन दर रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए है कि छात्र दिन-प्रतिदिन बिना किसी कठिनाई का सामना किए आसानी से अपने स्कूल जा सकते हैं।’

समस्या इतनी गंभीर क्यों है?

गांव के सरपंच नारायण धोडीबा जांगम

मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए आइए हम महाराष्ट्र के भोर जिले में स्थित एक गांव रायरेश्वर किला की हकीकत जानने की कोशिश करते हैं। गांव के सरपंच नारायण धोडीबा जांगम ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा, ‘अगर हमारे गांव का स्कूल बंद हो जाता है, तो बच्चों को दूसरे स्कूल तक जाने के लिए 10 किलोमीटर जाना होगा। छात्र अभी बहुत छोटे हैं और उनके लिए इतनी दूरी चलकर जाना मुश्किल है। हमारे स्कूल में सातवीं तक कक्षाएं हैं और छात्रों की संख्या करीब 15 है। यदि यह स्कूल बंद हो जाता है, तो ये बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएंगे, क्योंकि इसके बाद सबसे नजदीक स्कूल कोरल गांव में है, जो लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर स्थित है। बच्चों को स्कूल तक जाने के लिए तीन घंटे और वापस आने में तीन घंटे लगेंगे। इसके आलावा रास्ता भी बहुत ऊबड़-खाबड़ है।’ 

उनका कहना है, ‘छात्र गांव से दूर किसी दूसरे स्कूल में नहीं जा सकते क्योंकि वे अभी बहुत छोटे हैं। यहां तक कि यदि वे वहां जाना भी चाहें, तो वहां के लिए कोई परिवहन सुविधा नहीं और सुरक्षा व्यवस्था भी नहीं है। ग्रामीण इलाकों में युवा बच्चों से जिनकी उम्र सात-आठ साल हो उनसे हम विद्यालय तक जाने के लिए प्रतिदिन पांच से सात किलोमीटर चलने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

वस्तुस्थिति की अनदेखी

शैक्षिक परामर्शदाता और स्वतंत्र रिसर्चर किशोर डारेक

पुणे बासी शैक्षिक परामर्शदाता और स्वतंत्र रिसर्चर किशोर डारेक ने महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर छात्रों की आवाज बने। इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा। इस पत्र के माध्यम से सरकार के अन्य महकमों को भी इस निर्णय के विभिन्न दोषों के बारे में सूचित किया गया था। पत्र में कहा गया कि 1,314 स्कूलों को बंद करने के इस निर्णय ने एक छात्र के शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को छीन लिया है। इससे पहले भी, 18 दिसंबर, 2017 और 24 दिसंबर, 2017 को मुख्यमंत्री और राज्यपाल को दो और औपचारिक पत्र भेजे गए थे।

इन पत्रों के अनुसार, ‘वे स्कूल जो बंद किये जाने की सूची में शामिल हैं वहां के छात्र या बच्चे समाज की मुख्यधारा से कटे समूह से संबंधित हैं। स्कूल शिक्षा विभाग (एसईडी) ने उच्च स्तर पर गोपनीयता बनाए रखी और बच्चों की कुल श्रेणीवार संख्या से संबंधित उन आंकड़ों को सामने नहीं रखा, जो वास्तव में इस निर्णय से प्रभावित होंगे। इन प्रभावों के बारे में महाराष्ट्र के कुछ संसद सदस्यों (एमपी) ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी चिंता व्यक्त की है।’

पत्र में कुछ आंकड़े प्रस्तुत करते हुए सरकार से कहा कि, ‘जिलेवार विद्यालयों के बंद होने से वे छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे जो समाज की मुख्यधारा से कटे समूह से आते हैं। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में 49 स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जिनमें से 21 फीसद स्कूलों में पिछड़े समुदायों के सौ फीसद बच्चे हैं, 11 फीसद स्कूलों में हाशिए वाले समुदायों के 50 से 99 प्रतिशत बच्चे हैं। बंद किये गये स्कूलों की कुल संख्या 32 है जो समाज की मुख्यधारा से समाज की मुख्यधारा से कटे समूह के बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हैं। इन बंद स्कूलों में हाशिए वाले समूहों से बच्चों का कुल प्रतिशत 66 प्रतिशत है।’

पत्र में बताया गया, ‘पुणे जिले में, 76 स्कूल बंद किए जा रहे हैं, जिनमें से समाज की मुख्यधारा से कटे समूहों के 100 प्रतिशत बच्चों के स्कूल 19 हैं। हाशिए वाले समूह से 50 से 99 प्रतिशत बच्चों के स्कूल 11 हैं। बंद स्कूलों की कुल संख्या 33 है जो समाज की मुख्यधारा से कटे समूह वाले बच्चों को पूरा करता है। इन बंद स्कूलों में हाशिए वाले समूहों के बच्चों का कुल प्रतिशत 46.58 प्रतिशत है।’

पत्र में यह भी कहा गया, ‘सांगली जिले में, कुल 15 स्कूल बंद किये गये हैं। इनमें से तीन स्कूल ऐसे हैं जिनमें हाशिए वाले समूहों के 100 फीसद बच्चे हैं और जिन स्कूलों में ऐसे समूहों के 50 से 99 प्रतिशत बच्चे हैं उनकी संख्या सात हैं। इस तरह से दस स्कूल ऐसे थे जहां इस समूह से आने वाले बच्चे पढ़ते थे। और यह कुल बच्चों का 65.54 प्रतिशत है।’

इसका विश्लेषण करने पर आंकड़े और भी कहानी बयां करते हैं। सांगली जिले के चार स्कूलों में, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) छात्र बहुमत (54 से 93 प्रतिशत) और उसी जिले के दो अन्य स्कूलों में मुस्लिम छात्र बहुमत (85 से 100 प्रतिशत) है। एसईडी द्वारा बंद किए जा रहे स्कूलों में हाशिए वाले समूहों और इन समुदायों के कुल 65.54 प्रतिशत बच्चे थे। इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी नहीं छोड़ा जा सकता है कि इन छात्रों में से चार प्रतिशत छात्र सीडब्ल्यूएसएन वर्ग के हैं।

अहमदनगर जिले में, बंद होने वाले एक स्कूल में 100 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति (एसटी) बच्चे हैं जबकि पांच स्कूलों में 100 प्रतिशत मुस्लिम छात्र हैं। इसी जिले के अकेले अकोले ब्लॉक में बंद होने वाले 14 स्कूलों में से नौ स्कूलों में एसटी सेक्शन के सौ प्रतिशत बच्चे हैं।

बंद किये जा रहे स्कूलों में, पुणे जिले में एक स्कूल 100 प्रतिशत एससी छात्रों के लिए कैटरिंग कर रहा है, तीन स्कूलों में 100 प्रतिशत एसटी छात्र हैं, पांच स्कूलों में 100 प्रतिशत ओबीसी छात्र हैं और एक स्कूल में 100 प्रतिशत मुस्लिम छात्र हैं। केवल अहमदनगर जिले में ही एसटी श्रेणी के कुल 44.6 प्रतिशत बच्चे प्रभावित होंगे, जबकि उसी जिले के अकोले ब्लॉक में जिले की एसटी श्रेणी की सबसे ज्यादा जनसंख्या है जहां से करीब 87.6 प्रतिशत बच्चे एसटी सेक्शन के तहत आते में हैं।

मौजूदा विधियों का उल्लंघन

दी गई जानकारी से यह तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि एसईडी द्वारा लिये गये निर्णय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) के दिशानिर्देशों का स्पष्टरूप से उल्लंघन किया है। साथ ही, यह निर्णय स्थानीय समुदायों, स्कूल जाने वाले बच्चों, शिक्षकों और स्थानीय अधिकारियों से परामर्श किए बिना लिया गया है।

डारेक द्वारा लिखे गए पत्र ने अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे इस मुद्दे से संबंधित एसईडी द्वारा किए गए सभी निर्णयों को वापस लिया जाये। समाज के कई वर्गों ने डारेक के पत्र के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को डारेक द्वारा एक और पत्र में, दूरी के कारक को उल्लिखित किया गया था। आरटीई दो स्कूलों के बीच कोई दूरी निर्दिष्ट नहीं करता है। हालांकि, किसी बच्चे के घर से स्कूल की दूरी को जरूर निर्दिष्ट करता है। हालांकि, स्कूलों को बंद करने के बाद, ऐसे कई स्कूल हैं जो निर्दिष्ट एक किलोमीटर के बजाय बच्चों के घरों से तीन से चार किलोमीटर दूर स्थित हैं।

इसके अलावा, वर्धा और पटभानी जिलों में मराठी मीडियम स्कूलों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में विलय किये जा रहे हैं या उर्दू मीडियम स्कूलों को मराठी मीडियम स्कूलों के साथ विलय किए जा रहे हैं। पीईएसए अधिनियम, 1996, के तहत आने वाले कुछ स्कूलों को विलय किये जाने का खतरा है। हालांकि ऐसे कई संस्थान हैं जो ग्रामीण इलाकों में जरूरतमंद लोगों को शिक्षा प्रदान करने के मूल मकसद से काम कर रहे हैं। स्कूलों को बंद करने का निर्णय उनके कड़ी मेहनत को भी प्रभावित करेगा।

महाराष्ट्र सरकार का स्कूलबंदी का यह फैसला साफ तौर पर दिखाता है कि राज्य सरकार बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया कराने की अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाना चाहती है। आज यह हकीकत है कि अच्छी गुणवत्ता की माध्यमिक और उच्चम माध्यमिक शिक्षा हासिल करना समाज के मध्यम तबके की पहुंच से भी बाहर हो गया है। सरकार के ये कदम प्राथमिक शिक्षा को भी आम लोगों की पहुंच से बाहर कर देंगे।

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