सच्चाई यह है कि इन नियमों की परिधि में दूर-दूर तक भी न आने वाले ऐसे सैकड़ों संस्थान देश भर में न सिर्फ धड़ल्ले से चल रहे हैं, बल्कि डिग्रियां बांट कर छात्रों का भविष्य भी अंधकारमय बना रहे हैं। यूजीसी ने तो महज शिकायतों के आधार पर चंद ऐसे संस्थानों की ही सूची जारी की है। हकीकत यह है कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने की चाहत लिये काफी संख्या में छात्र जानकारी न होने के कारण भ्रम में ऐसे फर्जी संस्थानों के झांसे में फंसकर अपना भविष्य खराब करने को मजबूर हैं।

विकास पाण्डेय

हाल ही में यूजीसी अर्थात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश भर में चल रहे 24 फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी की है। इस चेतावनी के साथ कि ये 24 स्वघोषित तथा गैर-पंजीकृत संस्थान यूजीसी अधिनियम का उल्लंघन करते हुए चल रहे हैं और उन्हें फर्जी घोषित किया गया है। ये फर्जी विश्वविद्यालय किसी भी तरह की शैक्षणिक डिग्री देने के हकदार नहीं हैं। लिहाजा, छात्र अपने हित में ऐसे संस्थानों से दूर रहें।

सूची में महिला ग्राम विद्यापीठ इलाहाबाद (वीमेन्स यूनिवर्सिटी), गांधी हिंदी विद्यापीठ प्रयाग इलाहाबाद, नेशनल यूनिवर्सिटी आॅफ इलेक्ट्रो कांप्लेक्स होम्योपैथी कानपुर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ओपन यूनिवर्सिटी अलीगढ़, उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय कोसीकला मथुरा, महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविद्यालय प्रतापगढ़, इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद इन्सीट्यूशनल एरिया नोएडा फेज 3 आदि शामिल हैं। इसके अलावा दिल्ली के कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दरियांगज, यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी, वोकेशनल यूनिवर्सिटी, एडीआर सेन्ट्रिक ज्यूरिडिकल यूनिवर्सिटी, इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस एंड इंजीनियरिंग, विश्वकर्मा ओपन यूनिवर्सिटी, वाराणसी संस्कृत विवि के अलावा यौन उत्पीड़न के आरोपी बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित का आध्यत्मिक विश्वविद्यालय भी शामिल है।

ये फर्जी विश्वविद्यालय किसी भी तरह की शैक्षणिक डिग्री देने के हकदार नहीं

गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 22(1) के अनुसार केवल ऐसे विश्वविद्यालय जो केंद्र, राज्य/प्रांत अधिनियम या ऐसे संस्थान, जिन्हें खंड 3 के अंतर्गत विश्विद्यालय की मान्यता प्राप्त हो या ऐसे संस्थान, जिन्हें संसद के अधिनियम द्वारा शक्ति प्रदान की गई हो ही खंड 22(3) के तहत यूजीसी निर्दिष्ट डिग्री प्रदान कर सकते हैं। यूजीसी अधिनियम का खंड 23 किसी संस्थान द्वारा यूनीवर्सिटी शब्द के उपयोग को प्रतिबंधित करता है, यदि उनका गठन ऊपर वर्णित तरीकों/नियमों के तहत नहीं किया गया है।

सच्चाई यह है कि इन नियमों की परिधि में दूर-दूर तक भी न आने वाले ऐसे सैकड़ों संस्थान देश भर में न सिर्फ धड़ल्ले से चल रहे हैं, बल्कि डिग्रियां बांट कर छात्रों का भविष्य भी अंधकारमय बना रहे हैं। यूजीसी ने तो महज शिकायतों के आधार पर चंद ऐसे संस्थानों की ही सूची जारी की है। हकीकत यह है कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने की चाहत लिये काफी संख्या में छात्र जानकारी न होने के कारण भ्रम में ऐसे फर्जी संस्थानों के झांसे में फंसकर अपना भविष्य खराब करने को मजबूर हैं।

ऐसे संस्थानों के खिलाफ कितनी और कैसी कार्रवाई हो रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूजीसी के फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में जो संस्थान पहले शामिल थे, वे आज भी बदस्तूर जगह बनाये हुए हैं। खासकर उत्तर प्रदेश तो इस मामले में रिकॉर्ड ही स्थापित कर रहा है, जहां यूजीसी के फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल लगभग 40 प्रतिशत संस्थान स्थित हैं। यानी 24 में 8 फर्जी विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में हैं। वहीं देश की राजधानी दिल्ली भी बहुत पीछे नहीं है, जहां इन 24 में से 7 फर्जी विश्वविद्यालयों के चलने की बात कही गयी है।

दरअसल, फर्जी विश्वविद्यालय या संस्थान किसी एक या दो राज्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका दायरा समूचे देश में फैला हुआ है। और सिर्फ फैला ही नहीं है, ऐसे फर्जी संस्थान मजे से फूल-फल भी रहे हैं। सरकारों की आंख के सामने, प्रशासन की नाक के नीचे। छात्रों के साथ धोखाधड़ी करने वाले ऐसे संस्थानों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग उठती रही है, लेकिन होता कुछ नहीं। शासन-प्रशासन की मेहरबानी उन पर पहले भी थी, अब भी है। भुगत रहे हैं छात्र।

प्रख्यात शिक्षाविद्, भाषाविद् और समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रख्यात शिक्षाविद्, भाषाविद् और समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय तो फर्जी विश्वविद्यालय के मामले को ही सरकार की अकर्मण्यता मानते हैं। उनका कहना है, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की शैक्षणिक गतिविधियाँ सन्दिग्ध रही हैं। वह प्रत्येक नियम बनाने के लिए नितान्त निजी मानक रखता है। वर्षों से छद्म विश्वविद्यालयों की सूची प्रसारित की जाती रही हैं; परन्तु कोई परिणाम नहीं दिखता। वैसे विश्वविद्यालयों को मान्यता देनेवाली संस्थाओं के विरुद्ध ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ ने अब तक क्या किया है? जो स्वच्छ छवियुक्त विश्वविद्यालय हैं, वहाँ के अध्ययन-अध्यापन का वातावरण क्षरण की ओर है। इस दिशा में उक्त आयोग क्या कर रहा है?’

क्या यह हास्यास्पद नहीं है कि हर साल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ऐसे फर्जी संस्थानों की लिस्ट जारी करता है और फिर भी ऐसे संस्थान आराम से चल रहे हैं। हद तो यह है कि पुरानी सूची में शामिल संस्थान भी नयी सूची में जगह पा रहे हैं। उन पर इस सूची का कोई असर नहीं पड़ रहा। पिछले साल यानी 2017 में भी यूजीसी और आॅल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन ने नकली शिक्षा संस्थानों की सूची जारी की थी, जिसके अनुसार देश भर में 23 फर्जी यूनिवर्सिटीज और 279 टेक्निकल इंस्टिट्यूट्स थे। तब भी राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा 66 फर्जी शिक्षा संस्थान के चलने की बात कही गयी थी, जहां बिना इजाजत इंजीनियरिंग और बाकी टेक्निकल कोर्स कराये जा रहे थे। 23 फर्जी यूनिवर्सिटीज में से 7 के दिल्ली में होने का खुलासा किया गया था।

तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री महेंद्र नाथ पांडेय

तब भी तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री महेंद्र नाथ पांडेय की ओर से बयान आया था कि मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों को पत्र लिखकर फर्जी यूनिवर्सिटीज के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कर जांच कराने को कहा है। उन्होंने कहा था कि छात्रों के साथ धोखाधड़ी करने वालों और खुद को यूनिवर्सिटी बताकर फर्जी डिग्री देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी

इससे पहले भी यूजीसी ने 2016 में 22 फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी की थी और उत्तर प्रदेश में 9 फर्जी यूनिवर्सिटी होना बताया गया था। उस वक्त भी तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने इन विश्वविद्यालयों के खिलाफ जांच के आदेश दिए जाने की बात कही थी। 2015 में भी 21 फर्जी विश्वविद्यालयों की बात कही गयी थी। कहने का तात्पर्य कि हर साल फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी होती है और हर साल ऐसे नये संस्थान पैदा हो जाते हैं। पुराने भी कमोबेश बरकरार रहते हैं। आखिर ऐसा क्यों?

इस सवाल पर यूजीसी का हमेशा से एक ही जवाब रहा है, ‘हम ऐसी फर्जी यूनिवर्सिटी के खिलाफ कोई एक्शन तब तक नहीं ले सकते हैं, जब तक कि उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं दर्ज होती है।’ वहीं इस मसले पर राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के एक पूर्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, ‘मैं तो 10-15 साल से यह देख रहा हूं कि यूजीसी इस प्रकार के फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची हर साल जारी करता है, लेकिन इस बारे में हमारा रवैया लचर है और हमेशा ही ऐसा रहने वाला है। इस स्थिति में तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता है कि जब तक कि छात्र, अभिभावक, यूजीसी जैसी नियामक संस्थाएं मिलकर पहल नहीं करती हैं। सब चलता है की प्रवृत्ति के कारण जवाबदेही तय नहीं हो पाती है। आपके पास हर साल ऐसे फर्जी संस्थाओं की सूची आती है, क्यों नहीं तत्काल इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी जाती है? इन्हें काली सूची में क्यों नहीं डाला जाता है?’

बहरहाल, देश के लगभग सभी राज्यों के इन दिनों माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी 12वीं कक्षा के नतीजे जारी हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अभी ही इसके नतीजे आये हैं। ऐसे में छात्र स्नातक कोर्स में दाखिला लेने के लिए कॉलेजों और यूनिवर्सिटी की तरफ रुख करने में लगे हैं। ऐसे समय में फर्जी यूनीवर्सिटी को लेकर यूजीसी की आयी लिस्ट ने एक संदेह का वातावरण भी निर्मित किया है। बच्चे डर भी रहे हैं कि कहीं वे फर्जी संस्थानों के झांसे का शिकार न हो जाएं। यह अलग बात कि यूजीसी ऐसे संस्थानों से छात्रों को बचाने की गरज से ही अपनी सूची जारी करने की बात कह रहा है। लेकिन क्या इस सूची से इतर सब कुछ अच्छा-अच्छा है?

भारतीय कानून के अनुसार

क्या सिर्फ जाली विश्वविद्यालयों की सूची जारी कर देने से हमारी शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी…

1956 आयोग के प्रति यह दर्शाता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मानकों के संरक्षण के लिए ऐसे सभी कदम उठाए जाएं, जिन्हें उपयुक्त माना जाता है। अफसोस ऐसा हो नहीं रहा। बस अपना दामन झाड़ने की कोशिश ही ज्यादा हो रही है। कोई सूची जारी कर ऐसा कर रहा है, कोई राज्य सरकारों को ऐसे संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की हिदायत देकर तो कोई किसी और तरीके से। गौरतलब है कि यूजीसी ने पब्लिक नोटिस जारी करने के साथ ही विश्वविद्यालयों को भी निर्देशित किया है कि वे अपनी वेबसाइट पर इन फर्जी यूनिवर्सिटी की सूची अपलोड कर दें, ताकि छात्रों को समय रहते इसकी जानकारी हो सके।

दरअसल, ऐसे फर्जी संस्थानों में छात्रों के फंसने की खबरें अकसर आती रहती हैं। पिछले साल मेडिकल कोर्स फर्जी विश्वविद्यालय से कराने का मामला सामने आया था। डेलापीर स्थित एक संस्थान ने दिल्ली विश्वकर्मा यूनिवर्सिटी से संबद्धता दिखाकर सैकड़ों छात्रों के प्रवेश कराये। बाद में पता चला कि यूजीसी की फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में वह भी शामिल है। उसके बाद काफी हंगामा हुआ और जिला स्तरीय जांच भी हुई। लेकिन अंजाम क्या हुआ? किसी को पता नहीं। अब सवाल उठता है कि क्या सिर्फ जाली विश्वविद्यालयों की सूची जारी कर देने से हमारी शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाएगी। यदि ये विश्वविद्यालय फर्जी हैं तो उन लाखों छात्रों के भविष्य से खेलने वाले इन विश्वविद्यालयों के प्रबंधन वर्ग से जुड़े लोगों के साथ क्या सुलूक होना चाहिए? क्या इस दिशा में सरकारें कोई पहल कर सकती हैं? इन विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर अब तक जो विभिन्न व्यवसायों, नौकरियों में सेवारत हो चुके हैं, उनके सर्टिफिकेट की विश्वसनीयता पर क्या होना चाहिए? शिक्षा व्यवस्था को लेकर जब भी कोई इस तरह का काला अध्याय खुलता है, उस पर न तो कोई राजनेता बयान देता है, न कोई अधिकारी। जैसे सबको सांप सूंघ जाता है। इसके पीछे सच ये है कि इन्हीं वर्गों से जुड़े लोगों की सह पर देश में धड़ल्ले से इतने बड़े-बड़े कर्मकांड हो रहे हैं।

कड़वी सच्चाई है कि फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ कार्रवाई करने में यूनिवर्सिटी एक्ट पूरी तरह से अक्षम है। भारत में उच्च शिक्षा का पूरा अमला ही फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पुलिसिया कानून का मोहताज है। हालांकि मामला सामने आने पर इन फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ ड्राइव चलाया जाता है, लेकिन कानूनी पेंचीदगियों के आगे यह अंजाम तक नहीं पहुंच पाता। उल्लेखनीय है कि फर्जी विश्वविद्यालयों के संचालन के खिलाफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मानता है कि किसी भी मामले में कार्रवाई के बाद जब यह अदालत की चौखट पर पहुंचता है, तो संचालक महज एक हजार रुपए देकर मुक्ति पा लेता है।

फर्जी डिग्रियां बांटने वाली संस्थाओं के खिलाफ तमाम शिकायतें के बाद भी राज्य सरकार कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही है। फर्जी डिग्रियों का जोर कितना है और यह धंधा कितना विस्तार पा चुका है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में लगभग एक लाख लोग इन फर्जी विश्वविद्यालयों की डिग्रियों के सहारे नौकरी तक पहुंचने या नौकरी की खोज में हैं।

1987 में लोकसभा की याचिका समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम की धारा 24 के प्रावधानों में सुधार कर फर्जी विश्वविद्यालयों के संचालन को संज्ञेय कानून घोषित करने की सलाह दी थी। फर्जी विश्वविद्यालय की बढ़ती संख्या से चिंतित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर जी रामरेड्डी की पहल पर फर्जी विश्वविद्यालयों के संचालन के विरुद्ध छह माह की कड़ी कैद और एक लाख रुपए के जुर्माने की सजा का मसौदा तैयार किया था, परन्तु इस पर भी कोई विशेष अमल नहीं हो पाया। 17 फरवरी, 89 को मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से भी प्रेषण पत्र संख्या-एफ-9-8-88 के माध्यम से राज्यों के मुख्य सचिवों को स्वयंभू विश्वविद्यालयों से आगाह करते हुए कड़ाई से पेश आने की सलाह दी गई थी, परन्तु राज्य सरकार की ओर से इस दिशा में हुई कार्रवाई का परिणाम बेहद निराशाजनक रहा। फलत: ऐसे संस्थान कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ते गये हैं।

अंतत: कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में जैसे कई सारे अवयव थक चुके हैं, कई लुंज-पुंज होकर सड़ने-गलने लगे हैं, उनमें ही एक है भ्रष्टाचार के दलदल में धंस चुकी शिक्षा व्यवस्था। ऐसा लगता है सब कुछ शिक्षा माफिया के चंगुल में जा फंसा है। यूजीसी द्वारा जारी की गई 24 फर्जी विश्वविद्यालयों की लिस्ट इसी किस्म के सच की ओर इशारा कर रही है।

#यूजीसी    #फर्जीविश्वविद्यालय   #शिक्षामाफिया

 

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  1. डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

    अत्यन्त प्रभावकारी टिप्पणी है। आज विश्वविद्यालयीय संस्कृति किसी भी स्तर पर समृद्धि नहीं लक्षित हो रही है, कारण कि गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है। दशकों से तथाकथित छद्म विश्वविद्यालयों की लगभग यही सूची प्रसारित की जा रही है, परिणाम “ढाक के तीन पात”।
    शासन और विश्वविद्यालय-स्तर पर इस दिशा में कौन-सा प्रभावकारी निर्णय किया गया है?
    देश की सरकार को स्वस्थ शिक्षा से कोई प्रयोजन नहीं, उसकी सत्ता-महत्ता बनी रही, यही उसका ध्येय है।

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