किसी भी अर्थव्यवस्था में यह पूर्णतया असम्भव है कि वहां दीर्घकाल तक कृषि शिक्षा आधारित उद्योगों को छोड़ शेष उद्योग फलते-फूलते रहें। यदि ऐसा होता है तो वह एक पंगु अर्थव्यवस्था होगी। दीर्घकालीन आर्थिक विकास के लिये सभी उद्योगों की समन्वित उन्नति आवश्यक है जिसमें कृषि शिक्षा आधारित उद्योग सर्वाधिक योगदान देता है, हालांकि मौजूदा समय में हमने कृषि को उद्योगों की श्रेणी से पृथक कर दिया है। यही तथ्य विकास के रास्ते में प्रमुख रोड़ा है। क्या इसमें हमारी कृषि शिक्षा की निम्न गुणवत्ता ने भी अहम भूमिका निभाई है?

विकास पाण्डेय

बहरहाल उम्मीद पर दुनिया कायम है। भारत सरकार हर तरीके से हाथ-पैर मार रही है, तमाम एमओयू पर हस्ताक्षर कर रही है। इसी कड़ी में पिछले दिनों भारत में एग्रीकल्चरल हायर एजूकेशन के क्षेत्र में सुधार करने के लिए विश्व बैंक और भारतीय कृषि अनसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 1100 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना शुरू की है। इसका फायदा 75 कृषि विश्वविद्यालयों को मिलेगा।

इस परियोजना के लिए आधी धनराशि विश्व बैंक देगा और आधी धनराशि भारत सरकार से मिलेगी। धन का वितरण आईसीएआर आधारभूत ढांचा और सुविधाओं को सुधारने के साथ-साथ अपना अकादमिक रिकाॅर्ड शानदार रखने वाले शोधकर्ताओं में वितरित किया जायेगा, साथ ही उन छात्रों को भी इसकी सुविधा मिलेगी जो ऐसे इनोवेटिव शोध में लगे हैं जिसमें धन की आवश्यकता है।

परियोजना का उद्देश्य कृषि उच्च शिक्षा परिदृश्य में सुधार करना है। इससे संबंधित प्रोजेक्ट रिपोर्ट के अनुसार, कृषि विश्वविद्यालयों के 51 फीसद संकाय सदस्यों ने उसी विश्वविद्यालय से डिग्री ली है जहां वे पढ़ा रहे हैं। केवल 17 फीसद संकाय सदस्यों का उन विश्वविद्यालयों में नया नियोजन होता है। 46 फीसद शिक्षक एक ही संस्थान में 15-20 सालों से जमे हुए हैं। इस कारण शोधकर्ताओं और कृषि संबंधित उद्योगों के बीच संपर्क सीमित रहता है और बात आगे नहीं बढ़ पाती है।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय कृषि की पिछले दो दशकों में एक विरोधाभास की स्थिति रही है। जहां एक ओर, बड़े पैमाने पर सफलता की कहानियां और प्रगतिशील कृषि व्यवसाय मॉडल हैं, तो वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधन घट रहे हैं, ग्रामीण-शहरी आय का अंतर बढ़ रहा है। संयोग से एक सकारात्मक सत्य यह भी है की शिक्षित युवाओं को कृषि उद्यमों और व्यवसायों में फायदेमंद एवं अपार क्षमता की समझ है और वे कृषि क्षेत्र में कार्य करने के लिए उत्सुक भी हैं। देश के कई प्रगतिशील किसानों ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों में नवपरिवर्तन किया है ताकि वे बाजारों, उद्योगों और संस्थानों की ताकत से लाभ उठा सकें।

सफर अभी लंबा है!

सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले विशाल भारत में हरित क्रांति और कृषि अनुसंधान तंत्र के फैलाव के बाद भी परंपरागत तरीके से खेती करने वालों की बड़ी संख्या है। कृषि शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में वैसे तो काफी प्रगति हुई है लेकिन किसानों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। नेशलन एकेडमी आॅफ एग्रीकल्चरल साइंस के प्रेसीडेंट डाॅ. पंजाब सिंह भी इस बात से इक्तेफाक रखते हैं कि कृषि संबंधी योजनाओं के जमीनी अमल में अभी हमें बहुत कुछ करना है।

नेशलन एकेडमी आॅफ एग्रीकल्चरल साइंस के प्रेसीडेंट डाॅ. पंजाब सिंह

डाॅ. पंजाब सिंह का कहना है, ‘कृषि क्षेत्र की सुदृढ़ता का मतलब महज कृषि उत्पादन बढ़ना नहीं है, बल्कि किसानों की स्थिति में सुधार और कृषि को ग्रामीण रोजगार का अहम जरिया बनाना भी आवश्यक है। नेशलन एकेडमी आॅफ एग्रीकल्चरल साइंस देश का ऐसा संस्थान है, जो कृषि में उच्च शिक्षा की प्रासंगिकता और गुणवत्ता में सुधार करने की महती भूमिका निभा रहा है। भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित इस संस्थान ने अपने गठन के लगभग ढाई तीन दशकों में देश के कृषि परिदृश्य को एक नई दिशा देने की र्कोिशश की है, शोध मंच के रूप में कृषि क्षेत्र की तस्वीर को बहुत हद तक बदलने का काम किया है। निःसंदेह कृषि संबंधी उच्च शिक्षा को नया आयाम देना भी इसमें शामिल है।’

जब भारत में कृषि क्रांति की शुरुआत हुई तो वो भी एक कृषि संस्थान के महान वैज्ञानिक द्वारा ही हुई थी। देश की कृषि को विकसित किया जा सके इसके लिए सन् 1905 में पूसा में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान का गठन किया गया। देश के हर एक कोने में कृषि विकास को ले जाया जा सके इसके लिए कृषि संस्थानों, अनुसन्धान केंद्रों और कृषि विश्वविद्यालयों का गठन किया गया। इन संस्थानों में कृषि वैज्ञानिकों, कृषि के विद्यार्थियों और किसानों को एक-साथ जोड़ा गया।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के डाॅ. असित पाण्डेय

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के काॅलेज आॅफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन बेमेतरा में असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ. असित पाण्डेय ने बताया कि ‘कृषि विश्वविद्यालयों में कोर्स में समय समय पर डीन कमेटी सिलेबस में बदलाव करती है। इस समय पांचवीं डीन कमेटी चल रही है। इसके अलावा कृषि विश्वविद्यालय 20 प्रतिशत तक अपने कोर्स में बदलाव कर सकते हैं। इस तरह अपनी जरूरत या कहें मांग के मुताबिक कोर्स को रख सकते हैं। कृषि शिक्षा से संबंधित कोर्सेस की बात की जाये तो इसका स्कोप न कभी खत्म हुआ है और न ही कभी खत्म होगा। जब तब मानव है इस धरती पर तब तक उसको भोजन की आवश्यकता पड़ेगी और इसको पूरा करने के लिए कृषि वैज्ञानिक और किसानों का गठबंधन बराबर से बना रहेगा। देशभर में नये नये अनुसंधान हो रहे हैं और वे किसानों तक पहुंचाए जा रहे हैं।’

देशभर में इन संस्थानों से सम्बद्ध अलग-अलग राज्यों में 45 कृषि विश्वविद्यालय, 5 डीम्ड विश्वविद्यालय, 4 केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 63 राज्यस्तरीय कृषि संस्थान, 6 राष्ट्रीय ब्यूरो, 16 राष्ट्रीय अनुसन्धान केंद्र और 13 डायरेक्टेरेट ऑफ रिसर्च मौजूद हैं। यह संस्थान, विश्वविद्यालय और अनुसन्धान केंद्र देशभर में कृषि के हालात सुधारने के लिए कार्य कर रहे हैं। इन कृषि संस्थानों ने किसानों तक हाइब्रिड बीज, कृषि मशीनरी और नवीनीकरण को पहुंचाने का कार्य बखूबी किया है। लेकिन सीमांत कृषि अर्थव्यवस्था ने तो कृषि श्रम बाजार को पूरी तरह से जकड़ रखा है जो युवाओं को इसमें बड़े पैमाने पर भागीदारी करने से हतोत्साहित कर रही है, यह अर्थव्यवस्था बेहतर गुणवत्ता वाली जॉब्स मार्केट की जरूरत को इंगित करती रही है। दशकों से सरकारें भी इसे प्राथमिकता देती रही हैं। लेकिन सवाल है कि क्या सरकारों द्यारा यह राशि पर्याप्त थी। शिक्षा व्यवस्था में नये प्रयोगों को अपनाकर सुधार करने पर हमेशा से ही बहुत मामूली रकम (चालू वित्त वर्ष 2018 में सिर्फ 275 करोड़ रुपये) खर्च की जाती रही है।

अगर दुनिया के अन्य देशों को देखें तो पता चलता है कि अधिकतर जगहों पर समर्पित कृषि शिक्षा का तंत्र ही नहीं है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया जैसे देशों में विज्ञान, कला, चिकित्सा, इंजीनियरिंग के साथ विश्वविद्यालयों में कृषि संकाय हैं। हमारे यहां अलग से कृषि विश्वविद्यालय तो हैं लेकिन अधिकतर राज्यों के पास कमजोर ढांचा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अगर इनकी मदद न करे तो दयनीय स्थिति हो जाये। परिषद के पास लंबा चैड़ा तंत्र है लेकिन अनुसंधान और विकास मद में भारत सरकार द्वारा आवंटित कुल रकम का 14 फीसदी हिस्सा ही कृषि अनुसंधान और शिक्षा के हिस्से में आता है। वहीं परिषद के बजट का आधा हिस्सा कृषि विश्वविद्यालयों पर व्यय हो जाता है।

लेकिन अरसे तक परंपरागत खेती हमारे पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं रही। अब जरूर इस दिशा में कुछ काम हो रहा है और ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था पर भी कुछ नयी पहल हुई है। स्नातक स्तर के 11 विषयों में कई बदलाव हो रहे हैं। अब पहले साल के पाठ्यक्रमों में परंपरागत कृषि जबकि दूसरे साल में भारतीय प्रौद्योगिकी पर जोर दिया जा रहा है। तीसरे साल में प्रतिभा विकास और चैथे साल में जमीनी अनुभवों पर। किसानों के साथ रहते हुए छात्र उनको तमाम मसलों का हल बताते हुए खुद सीखेंगे। ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें करीब 62 फीसदी से 67 फीसदी तक प्रैक्टिकल है। बेशक यह एक अच्छी पहल है।

इसी कड़ी में भारत में हार्वेस्ट प्लस परियोजना को किसानों तक पहुंचाने के लिए फ्रांस की कंसल्टेटिव ग्रुप फॉर इंटरनेश्नल एग्रीकल्चर संस्था (सीजीआईएआर) और यूपी सहित चार राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों की मदद से चलाया जा रहा है। इस परियोजना की मदद से उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, हरियाणा और पंजाब के लाखों किसानों को पोषक तत्वों से भरपूर गेहूं जैसी फसलों की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

किसानों की सहभागिता से चलाई जा रही हार्वेस्ट प्लस परियोजना के बारे में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. साकेत कुशवाहा कहते हैं, ‘इस परियोजना में हमने देश भर के बीज बैंकों में रखी गई उन प्रजातियों को खोजा, जिनमें सूक्ष्म पोषक तत्व ज्यादा थे पर उनकी उपज कम थी। इन प्रजातियों को हमने अधिक उपज मगर कम पोषक तत्वों वाले अनाज की किस्मों के साथ प्रजनन करवाया। यह परीक्षण किसानों के खेतों में ही किया जाता है।’

विश्व बैंक की सौगात

प्रोजेक्ट वर्ल्ड बैंक की साइट के अनुसार भारत सरकार द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना के अन्तर्गत देश में 2017-18 में शुरू होने वाली परियोजना में संस्थागत विकास प्रोजेक्ट (आईडीपी) के लिए देश के 8 कृषि संस्थानों का चयन किया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य संस्थागत अकादमिक उन्नयन द्वारा स्नातक विद्यार्थियों में सीखने की दक्षता में सुधार लाना, रोजगार तथा उद्यमिता में वृद्धि करना, कार्य पद्धति प्रबन्धन तथा दक्षता में सुधार द्वारा शैक्षिक तथा अशैक्षिक सुधार लाना, विश्वविद्यालय के अध्यापकों तथा स्टाफ के सदस्यों की प्रतिस्पर्धात्मक गुणवत्ता बढ़ाना तथा शैक्षणिक संस्थान तथा उद्योगों के मध्य सामन्जस्य बढ़ाकर स्नात्तकों के गुणवत्ता मानकों तथा उद्यमिता अवसरों में बढ़ोतरी करना तथा उद्यमिता कौशल को स्टैण्ड अप इंडिया, स्किल इंडिया स्टार्टअप इंडिया तथा डिजिटल इंडिया के उद्धेश्यों को प्राप्त करना है।’

गौरतलब है इस परियोजना के प्राप्त होने से चुने गये विश्वविद्यालयों को शैक्षिक एवं अशैक्षिक विकास तथा ढांचागत गुणवत्ता बढ़ाने में मदद मिलेगी। अब विश्वविद्यालयों का फोकस स्नातक विद्यार्थियों के शैक्षणिक कौशल में व्यावहारिक गुणवत्ता बढ़ाने तथा उनको नई उपयोगी तकनीकों में दक्ष कर राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने पर रहेगा। इसके तहत राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों तथा अध्यापकों को कृषि के आधुनिक विषयों तथा क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण का प्रावधान रखा गया है, साथ ही उच्च गुणवत्ता वाले तकनीकी यंत्रों तथा मशीनों के प्रायोगिक ज्ञान तथा वाई-फाई नेटवर्किंग एवं वेब आधारित स्मार्ट ज्ञान अर्जन पर विशेष ध्यान देने की बात भी की जा रही है।

गौरतलब है कि विकास के लिए हमारे एवं विदेशी विद्यार्थियों को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालयों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण के अवसर प्राप्त होंगे साथ ही दूसरे देशों की संस्थाओं से जुड़ाव के अवसर भी प्राप्त होंगे। उद्यमिता कोर्स, वोकेशनल कोर्स, रूचि आधारित कौशल विकास, विद्यार्थी इन्टर्नशिप, माॅडल प्रोजेक्ट्स, उच्च गुणवत्ता रिसर्च पेपर, तकनीकी व्यवसायीकरण, उद्योग आमुखीकरण, उद्यमिता आमुखीकरण एवं उद्योग जुड़ाव आदि विषयों पर विशेष कार्य किया जायेगा। इस परियोजना के माध्यम से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि व फैकल्टी का विविधीकरण होगा। शिक्षक और विद्यार्थी अनुपात में सुधार, उद्योग आधारित कार्यक्रमों में बढोतरी तथा शिक्षण एवं मूल्यांकन गुणवत्ता के मानकों में वृद्धि होगी।

आयुर्वेत लिमिटेड के आरएंडडी विभाग की सीनियर अधिकारी डाॅ. प्रीति तिवारी

रिसर्च एवं इनोवेशन क्षेत्र में अग्रणी कंपनी आयुर्वेत लिमिटेड ने कृषि उद्यम को बढ़ावा देने के क्षेत्र में कई प्रतिमान स्थापित किये हैं। आयुर्वेत लिमिटेड के आरएंडडी विभाग की एक सीनियर अधिकारी डाॅ. प्रीति तिवारी ने भारतीय कृषि शिक्षा को नये उद्यमों के लिए सकारात्मक बताया। वह कहती हैं कि, ‘कृषि शिक्षा चेंजेज मोड में है, नई-नई टेक्नोलाॅजी आ रही हैं, एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटीज उनको प्रमोट भी कर रही हैं। हमारी सरकार को चाहिए कि वे निजी क्षेत्र के संस्थानों को कृषि अनुसंधान और विकास में दिलचस्पी लेने के लिए प्रोत्साहित करे। भारत के अनुसंधान और विकास तंत्र में सुधार के लिए कुछ निजी कंपनियां आगे आ रही हैं और इसके लिए सरकारी और शिक्षण संस्थानों से गठजोड़ कर रही हैं। सरकार को इन प्रयासों में जुटी कंपनियों को प्रोत्साहित करने पर ध्यान देने की जरूरत है। विश्वविद्यालय भी बीजों, उपकरणों और अनुसंधानों पर एमओययू कर रहे हैं।’

कृषि क्षेत्र में करियर की संभावनाओं के सवाल पर डाॅ. तिवारी बताती हैं, ‘कृषि क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने वाले छात्रों के लिए काफी संभावनाएं बढ़ गई हैं। कृषि से संबंधित कई सारी संस्थाओं में, जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की मदद से कई परियोजनाओं पर कार्य कर रही हैं, साथ ही बीज, उपकरण, फर्टिलाइजर कंपनियों आदि में कृषि विशेषज्ञों की काफी मांग बढ़ रही है। वैसे आजकल एमबीए एग्री बिजनेस का स्कोप है जो छात्रों की सफलता को सुनिश्चित भी कर रहा है।’

जाॅब पकड़ने के बजाय उद्यमी बनने के सवाल पर डाॅ. प्रीति अपने संस्थान का उदाहरण देते हुए बताती हैं, ‘हमारी स्टेट-टू-आर्ट प्रयोगशालाओं में हम हाइड्रो नर्सरी तैयार करते हैं जो मेवेशियों के लिए अंकुरित चारा का निर्माण करती है। इसे हम नई टैक्नोलाॅजी का प्रयोग कर पानी में ही पौध उगाते हैं जिसकी प्रक्रिया कहुत ही कम जगह में पूरी हो जाती है। बाद में इस नर्सरी को गांव की खाली पड़ी जमीन में रोपित कर दिया जाता है। इस तरह से उत्पन्न अंकुरित चारा पशुओं के लिए बहुत ही पौष्टिक होता है। कृषि के छात्र ऐसी ही तकनीक में पारंगत होकी उद्यमी बन सकते हैं और दूसरों को रोजगार भी दे सकते हैं।’

गोबिन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर

इस तस्वीर के दूसरे पहलु को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। गोबिन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर जिसे हरित क्रांति की जन्मस्थली भी कहा जाता है, यह उत्तर भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारत में कृषि नवाचार एवं उन्नत बीज के अनुसंधान के लिए विख्यात है। पंतनगर कृषि एवं प्राद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार वह लगभग 280 किस्में विकसित कर चुका है जिसमें से 13 किस्मों को सरकार द्वारा लैंडमार्क किस्मों का दर्जा दिया गया यानि कि यह किस्में किसी भी विशेष क्षेत्र तक सीमित न रहकर पूरे देश में इस्तेमाल के लिए अनुकूल हैं। हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन एवं शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक ट्वीट के माध्यम से जानकारी दी कि टाइम्स की एशिया रैंकिग में 350 की सूची में भारत के अन्य संस्थानों के साथ यह विश्वविद्यालय को भी शुमार किया गया है।

लेकिन हकीकत कुछ और भी बयां करती है। दरअसल, भारत के पास अभी तक पूर्ण रूप से स्वीकार्य कोई कृषि नीति है ही नहीं। आजादी के बाद से लेकर 70 के दशक के मध्य तक कृषि भारी दबाव के साथ मझदार में ही फंसी रही। 60 के दशक में खाद्य संकट गहराने लगा था, तब इस क्षेत्र में तकनीक के सफल उपयोग को लेकर पहली बार राजनीतिक सहमति बनती नजर आई और इसके नतीजे के रूप में पहली हरित क्रांति का अगाज हुआ और उसका प्रभाव वर्ष 2000 तक बना रहा। 2000 में कृषि के अनुकूल माहौल का सृजन करने में सरकार का योगदान दिखा और तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने नई राष्ट्रीय कृषि नीति में कृषि विकास दर 4 प्रतिशत तक पहुंचाने के लक्ष्य की घोषणा की, जो कि बीते डेढ़ दशक में कभी मूर्त रूप नहीं ले सका। इसलिए यह कहना सही होगा कि सफर अभी लंबा है और बहुत दूर तक जाना है।

#आईसीएआर   #एग्रीकल्चरलहायरएजूकेशन  #वर्ल्डबैंक  

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